इक अजीब सी कशमकश है . . . . . . . . .

इक अजीब सी कशमकश है|

जब होते हैं अकेले तो सब याद आते हैं,
पर जब साथ हों तो चंद पलों में लम्हे बीत जाते हैं|
क्या ज़िंदगी का यही दस्तूर है?
जब साथ हों तो कुछ कदर ही नहीं,
पर जब दूर जाएं तो तन्हां हों जाते हैं|

ज़िंदगी के रंग-मंच पर सब अनोखे खिलाडी हैं,
पर इसे खेलते-खेलते सब अपनी यादें छोड़ जाते हैं|
जिसके बारे में कभी कुछ सोचा न हों,
वो बीते पलों में बार-बार याद आतें हैं|

वाकई ये इक अजीब सी कशमकश है|

जब याद आतें हैं वो, इक मुस्कान सी आ जाती है,
उनकी यादें मुझे रह-रहकर सताती हैं|
मैं अलबेला सा रहा हरपल दूर जिन पलों से,
उन पलों की यादें मुझे अंदर ही अंदर खाती हैं|

आज ये अलबेला इनके सामने बेबस है,
ये ज़िंदगी नही, इक अजीब सी कशमकश है . . . . . . . . .
     
                                         - मनिंदर सिंह 

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