ये जो तू रूठ जाती है ना . . .

ये जो तू रूठ जाती है ना,
घडी की सुइयां मानो रुक सी जाती हैं
हर इक लम्हा सौ लम्हों सा हो जाता है
समय की रेत गिरने से पहले ही बिखर जाती है
हर रात अमावस सी स्याह हो जाती है

ये जो तू रूठ जाती है ना,
मानों खुद के शहर में अनजान सा हो जाता हूँ
हर मोड़, हर गली अजनबी सी हो जाती है
मानों खुद में ही खुद की पहचान ढूंढता हूँ
यों चलते-चलते लोगों से अपना ही पता पूछता हूँ

ये जो तू रूठ जाती है ना,
तू मेरी कमज़ोरी ही नहीं, ताकत भी बन जाती है
मुझे फिर से उठने का साहस भी दे जाती है
शायद इसमें भी कहीं तेरी चाहत ही छुपी है
जो मुझे फिर से चलने की इक नई शुरुआत दे जाती है

ऐ ज़िन्दगी . . .
तू वाकई बेमिसाल है . . .


                                      - मनिंदर सिंह 

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