गुलाब

आज पन्ने पलटते-पलटते
इक गुलाब मिला . . .
वो गुलाब जो शायद
कई अर्से से कुछ सहेजे बैठा था . . .
शायद यों ही रख दिया था
इक याद समझ कर . . .
वो सूखी पंखुड़ियाँ गहरे रंग की हो गयी थीं
मानो उन यादों को ताज़ा करने की कोशिश कर रही हों . . .
पर धुंधली पड़ रही यादों के समान,
वो खुशबू भी धुंधला सी गयी थी . . .
पर अपनी उसी कोशिश में इक गुलाब मिला . . .
जो बीते गुजरते सुखन का अहसास था . . .
बस यों ही पन्ने पलटते-पलटते
इक गुलाब मिला . . .


                                              - मनिंदर सिंह

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