फिर रुक गयी . . .



आज चलते-चलते फिर रुक गयी

और . . . यों खड़ी हो गयी,
मानो कुछ भी बाकी ना रहा हो,
मानो कुछ ख्वाहिशें अधूरी रह गयी |

पहले कभी भी उसे ऐसा नहीं देखा,

हाँ . . . कभी-कभी टूट जाया करती थी,
लेकिन हौंसलों की उड़ान कहीं ले ही जाती थी उसे |
पर आज मानो कुछ कहना चाह रही थी,
लेकिन रुंधे गले से कुछ निकल ही नहीं |

कोशिश की उसे फिर से खड़ा करने की,
पर शायद कोई गहरी टीस ही रही होगी |
उस मासूम से चेहरे पर यों शिकन अच्छी  लगी ही नही कभी,
वो हंसती हुई, गुनगुनाती ही प्यारी लगती थी |

पर न जाने आज क्यों . . . .
मेरी प्रिय कलम यों अचानक ही रुक गयी . . .

                                      - मनिंदर सिंह

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