सभी पूछते हैं, मैं आखिर लिखता क्यों हूँ ?
शायद कुछ अहसासों को मुहब्बत है इन कोरे पन्नों से,
कि जब तक उतरते नहीं इनपर,
तब तक भनक सी नही लगती |
मानो एक तरफ़ा प्यार की अहमियत सीखा रहे हों,
खुद उभर कर इन पर,
कागज़ और कलम का मिलन करवा रहे हों |
शायद अहसासों को महसूस करना आसाँ नहीं,
पर हर दिल तक पहुँचाने की इक कोशिश करता हूँ |
हाँ, शायद इसलिए लिखता हूँ |
शायद इक कोशिश करता हूँ,
उस वीरान से कोने को भरने की,
जहाँ बरसों पहले यादें दफ़न हुआ करती थीं |
बस इक कोशिश सी करता हूँ,
उसे फिर से हरा करने की,
जहाँ लम्हों के मुरझाने की रस्म हुआ करती थी |
जो मौन पड़े कई अर्सों से,
उन्ही शब्दों को आवाज़ बनाने की कोशिश करता हूँ,
हाँ, शायद इसीलिए ही लिखता हूँ |
- मनिंदर सिंह
शायद कुछ अहसासों को मुहब्बत है इन कोरे पन्नों से,
कि जब तक उतरते नहीं इनपर,
तब तक भनक सी नही लगती |
मानो एक तरफ़ा प्यार की अहमियत सीखा रहे हों,
खुद उभर कर इन पर,
कागज़ और कलम का मिलन करवा रहे हों |
शायद अहसासों को महसूस करना आसाँ नहीं,
पर हर दिल तक पहुँचाने की इक कोशिश करता हूँ |
हाँ, शायद इसलिए लिखता हूँ |
शायद इक कोशिश करता हूँ,
उस वीरान से कोने को भरने की,
जहाँ बरसों पहले यादें दफ़न हुआ करती थीं |
बस इक कोशिश सी करता हूँ,
उसे फिर से हरा करने की,
जहाँ लम्हों के मुरझाने की रस्म हुआ करती थी |
जो मौन पड़े कई अर्सों से,
उन्ही शब्दों को आवाज़ बनाने की कोशिश करता हूँ,
हाँ, शायद इसीलिए ही लिखता हूँ |
- मनिंदर सिंह

Comments
Post a Comment