चल रहा हूँ रेत पर,
पर वो सुकून साथ का कहाँ ?
बढ़ रहा हूँ रेत पर,
पर वो एहसास हाथ का कहाँ ?
अकेला निकल गया हूँ पर कोई साथ तो बाकी है,
मिल गया है सबकुछ पर शायद कुछ तो बाकी है |
कुछ लफ्ज़ अभी भी अधूरे से हैं,
कुछ लफ्ज़ न चाहकर भी पूरे से हैं |
यों लिखती है बेदम कलम हर कदम,
इंतज़ार में रंगीं सफ़े भी भूरे से हैं |
ढल गया दिन वहीं, पर कोई रात तो बाकी है,
रह गया मैं वहीं, पर कोई साथ तो बाकी है |
- मनिंदर सिंह
पर वो सुकून साथ का कहाँ ?
बढ़ रहा हूँ रेत पर,
पर वो एहसास हाथ का कहाँ ?
अकेला निकल गया हूँ पर कोई साथ तो बाकी है,
मिल गया है सबकुछ पर शायद कुछ तो बाकी है |
कुछ लफ्ज़ अभी भी अधूरे से हैं,
कुछ लफ्ज़ न चाहकर भी पूरे से हैं |
यों लिखती है बेदम कलम हर कदम,
इंतज़ार में रंगीं सफ़े भी भूरे से हैं |
ढल गया दिन वहीं, पर कोई रात तो बाकी है,
रह गया मैं वहीं, पर कोई साथ तो बाकी है |
- मनिंदर सिंह

Comments
Post a Comment