पिता

बडी रंगीं सी इस दुनिया में ,
मेरा जो यों आना था ।
मेरे लिए बस वो ममता थी ,
ममता ही मेरा खजाना था ।
ममता से परे मुझपर अपना ,
कोई हाथ बढ़ाए खड़ा था ।
मेरे जीवन के हर तम में ,
कोई दीया जलाए खड़ा था ।

धीरे-धीरे खड़ा होने लगा ,
उस वृक्ष की छाया में सोने लगा ।
अंजाने में ही उसके समान ,
हर गुण अपना बोने लगा ।
दिन-रात अपना एक कर ,
कोई खुशियाँ फैलाए खड़ा था ।
मेरे हर इक दुख में भी ,
कोई दीया जलाए खड़ा था ।

बड़ा दूर समझता था उससे,
पर हर कदम बना वो साया था।
अपनी तकलीफों को वो यों भुला ,
न जाने कहाँ से आया था ।
मेरी नन्हीं सी इक हंसी को ,
वो दिल में समाए खड़ा था ।
आँखों में इक चमक लिए ,
कोई दीया जलाए खड़ा था ।

आज सोच-सोच हर त्याग को ,
खुदगर्ज़ मैं यों रो रहा था।
आज देख हौंसले उस पर्वत के ,
खुद ही खुद में यों खो रहा था ।
आज मेरे हर इक आँसू को ,
कोई मुट्ठी में छिपाए खड़ा था ।
मेरी नन्हीं सी इस दुनिया को ,
कोई दुनिया बनाए खड़ा था ।

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