हर राही को मंज़िल की ओर बढ़ते देखा है |
बहुत सो लिया हूँ इस असीम सी रात में,
बड़े दिनों बाद आज रातों को ढलते देखा है |
दिन क्या है ? रात क्या है ?
इसी समझ को ना समझे दुनिया भागती है |
दिन को रात के पछतावे में बिताकर,
हर रात में नए पछतावों में जागती है |
बड़े मजबूत से दिख रहे है मुझे वो तारे,
बड़े अरसे से किसी को रात से लड़ते देखा है |
गहरा रिश्ता होता है तम का इस रात से,
आज पहली बार तम को यूं बिछड़ते देखा है |
- मनिंदर सिंह

incredible thoughts in priceless words...
ReplyDeleteby..a man with eyes of heart n tears of enthusiasm
Thnq Manish . . .
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