राज़ . . .

ऐ मन भंवर , क्या राज़ है तुझमे,
बड़ी अज़ब सी निगाहों से ताकता है
बड़े अच्छे से काटता है सुर्ख दुपहर,
रातों को उठ-उठ जागता है

क्या छूट गया है पीछे तेरा,
क्या ख्वाब अधूरा रह गया
क्या दर्द छुपा है तुझमें,
जो आँखों से यों बह गया

आँखों में तू सब कुछ छिपा,
बड़ा मजबूत सा तू है रहा,
पर न जाने ये कैसा गम,
दिल ही दिल में यों सह गया

पछतावे को न दूर करके,
गर यों ही तू भागेगा
बन जायेगा नासूर ये इतना
और यों ही रातों में जागेगा . . . . .

                   - मनिंदर सिंह 

Comments

  1. teri bato main dard main tham gya h mera dil
    ab na jane kb yeah wapas darkhege yr

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