जब पहली बार
आँख खुलती है,
सब दुनिया अनजान
होती है,
इन नन्ही नन्ही आँखों
में , बस उसकी
ही पहचान होती
है|
जब घबरा जाता
हूँ मैं, तो
आँखें उसकी भी
बहती हैं,
वो इक अनमोल
फरिश्ता है, जिसे
दुनिया माँ कहती
है|
मैं अब धीरे
धीरे पहचान रहा
हूँ,
एक टक देखता
हूँ,जिसे अपना
मान रहा हूँ,
इक ख़ुशी सी
घूमती है उन
आँखों में,
जिन्हे बड़े गौर
से जान रहा
हूँ|
वो काम में
व्यस्त होकर भी,मेरी हंसी
को ताकती रहती
है,
वो है ख़ुदा
और संसार मेरा,
जिसे दुनिया माँ
कहती है|
जब बोला मैं
आज पहली बार,
सब खुशियाँ यों मना
रहे थे,
मेरे मुख से
निकले उन शब्दों
को,
वो ख़ुशी से
गुनगुना रहे थे
,
जिसे पुकारा है मैंने
पहली बार, वो
अपनी ख़ुशी मन
में समायी रहती
है,
वो मेरे कंठ
का है पहला
शब्द, जिसे दुनिया
माँ कहती है
|
मुझे चलता यूँ
देख वो ,
इक अलग सी
चमक बिखेर रही
है ,
मुझे यूँ डगमगाता
देख वो ,
फौरन सम्भला
मेरे पैर रही
है ,
मेरे बचपन की
वो घड़ियाँ बटोर
, अपने सीने से
लगाये रहती है
,
मेरी ज़िन्दगी का वो
आधार है , जिसे दुनिया
माँ कहती है
|
यों अलबेली सी यादों संग मैं,
धीरे -धीरे मैं
अब बड़ा हो
रहा हूँ|
उस गुरु-रुपी
मूरत के,
नक़्शे-क़दमों पर खड़ा
हो रहा हूँ|
लाखों लोगों में भी
उसे, मेरी आँखें
ढूंढती रहती हैं,
और कहो उसे
क्या नाम दूँ,
जिसे दुनिया माँ
कहती है|
ऐ माँ गर
भूल हो जाए
कोई,
मुझे चाहे दो
लगा देना|
यों मेरी ज़िन्दगी
में रहकर,
मेरे हर गम
मिटा देना|
यों छोड़ना ना मेरा
साथ कभी,
गर अनजाने में मैं
बहक जाऊं|
मेरी अँधेरी सी ज़िन्दगी
में,
तेरी ममता का
दीया जला देना|
माँ तुझमें वो मोह
ममता है,जिसे पाने की
चाहत खुदा में
भी रहती है,
तू धरती है,
तू अम्बर है,इसलिए दुनिया तुझे माँ
कहती है . . . . . .

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