जिंदगी की इस
उड़ान में,
मैं उड़ता
एक परिंदा,
ढूंढता रहा हूँ
हर मोड़
पे कोई
एक ऐसा
अपना,
जो समझे मेरी
हर बात
को, ये
देखता था
सपना |
कहते उसे कोई
मित्र, दोस्त
तो कोई
उसे फ्रेंड
,
जो कभी भी
ना बदले
चाहे बदले
लाखों ट्रेंड
|
मिला ऐसा ही
दोस्त मुझे
पर मैं
न समझ
पाया,
हुई बहुत ही
देर जब
समझ में
मेरी सब
आया |
पता चले मायने
इस ढाई
अक्षर के
शब्द के,
नहीं भुला पाया
जो लम्हे
गुजारे तब
के |
जान सका की
आखिर सच्चा
दोस्त किसे
कहते हैं,
दोस्त वही है
प्राण जिसके
दोस्त में
ही रहते
हैं |
जाने से उसके
उठा विश्वास
इस नाम
से,
दोस्त कहाँ है,
आजकल रखते
सब मतलब
काम काम
से |
सोचा न था कि वो
पल फिर
से दोहराएगा,
इस अंधेर गम
भरी दुनिया
में मेरी
हंसी फिर
लौटाएगा |
अब रोज की
नोंक-झोंक
से दुनिया
मेरी पूरी
थी,
एक दिन न भी
मिल पता
तो जैसे
सुबह-शाम
अधूरी थी
|
बात-बात पर
इक दूजे
से लड़ना
यों भाता
था,
रूठ जाते फिर
भी चुप
रहना न
आता था
|
लौटा मेरी ख़ुशी
आज वो
जा रहा
है अपनी
राह पे,
समझा मुझे दोस्ती
का मतलब
वो जा
रहा है
अपनी राह
पे |
ऐ दोस्त अब
मैं तेरे
बिन न
जाने कैसे
रह पाउँगा,
गर रूठ गया
तुझे मनाने
कहा जाऊंगा
|
मेरे लिए तेरी
दोस्ती एक
सुनहरी सी
याद है,
रहे सलामत फूले-फले मेरी
यही फरियाद
है |
प्रिय मित्र हिमांशु अग्रवाल को समर्पित,
मनिंदर सिंह

Awesome :-D
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