एक कविता दोस्त के नाम............

जिंदगी की इस उड़ान में, मैं उड़ता एक परिंदा,
ढूंढता रहा हूँ हर मोड़ पे कोई एक ऐसा अपना,
जो समझे मेरी हर बात को, ये देखता था सपना |
कहते उसे कोई मित्र, दोस्त तो कोई उसे फ्रेंड ,
जो कभी भी ना बदले चाहे बदले लाखों ट्रेंड |
मिला ऐसा ही दोस्त मुझे पर मैं समझ पाया,
हुई बहुत ही देर जब समझ में मेरी सब आया |
पता चले मायने इस ढाई अक्षर के शब्द के,
नहीं भुला पाया जो लम्हे गुजारे तब के |
जान सका की आखिर सच्चा दोस्त किसे कहते हैं,
दोस्त वही है प्राण जिसके दोस्त में ही रहते हैं |

जाने से उसके उठा विश्वास इस नाम से,
दोस्त कहाँ है, आजकल रखते सब मतलब काम काम से |
सोचा था कि वो पल फिर से दोहराएगा,
इस अंधेर गम भरी दुनिया में मेरी हंसी फिर लौटाएगा |
अब रोज की नोंक-झोंक से दुनिया मेरी पूरी थी,
एक दिन न भी मिल पता तो जैसे सुबह-शाम अधूरी थी |
बात-बात पर इक दूजे से लड़ना यों भाता था,
रूठ जाते फिर भी चुप रहना आता था |
लौटा मेरी ख़ुशी आज वो जा रहा है अपनी राह पे,
समझा मुझे दोस्ती का मतलब वो जा रहा है अपनी राह पे |
दोस्त अब मैं तेरे बिन जाने कैसे रह पाउँगा,
गर रूठ गया तुझे मनाने कहा जाऊंगा |
मेरे लिए तेरी दोस्ती एक सुनहरी सी याद है,
रहे सलामत फूले-फले मेरी यही फरियाद है |


प्रिय मित्र हिमांशु अग्रवाल को समर्पित,
मनिंदर सिंह  

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